यादों की पोथी

Dried Rose on an Old Book

कल मैंने खोला इक पोथी को

बन्द मिली मुझे ज़हन के कमरे में

बीते दिनों की बात वो कहता था

जो पन्ना भरा था छुटपन से

माँ की सीख और बाबा का लाड़

बस तेज़ सा सरकता जैसे पलछिन्न

साईकल, वर्दी, बस्ते, छुट्टी की चाह

और रीझें कई स्याही से भरी

वो सफा अपनी, अपने जैसों की बात सुनाता था

और खिले हँसी ठठ्ठों से भरा

भूले यारों के किस्सों से जड़ा

जन्मदिन पर मिलने वाले तोहफों की

जो महँगे थे ये पता नहीं

पर जज़्बात के भोले अल्हड से

अबतक यादों में ताज़ा हैं

पतंगो के रंग.. चूड़ियों के डिब्बे

डायरी में सूखे फूलों से सना

कभी रुक जाता है वक़्त यूँही

मुझसे कुछ सांझा करने को

वो वक़्त फिसला कब ये याद नहीं

पर ताज़ा सा मिला जहां छोड़ा था

यादों की सिमटी इक पोथी में…

Image source- Google

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