क़ुदरत

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कई बार मिलता हूँ सुकून से मैं जब भी ख़ूबसूरती मिल जाती है बहाने से..
ख़ामोश हो जाता हूँ काँटों से जड़े हुए गुलाब को देखकर
वो खिला सा मुस्कराता जाता है…मानो अनजान है कल अपने मुरझाने से

फिर सुबह को देखता हूँ खिड़कियों से झाँकते हुए
जो दोपहर से शाम और शाम से रात में ढलने को तैयार है
अँधेरा है रात का तो क्या हुआ…उस पार फिर दिन का आग़ाज़ है

और मासूमियत देखता हूँ मैं नदी की
जिसको मालूम ही नहीं अपने होने का..बस समंदर से वफ़ा का ख़्याल है

मैं देखता हूँ इन खड़े हुए पेड़ों की रूहों को जो डालियों पर लदे हैं कहानियाँ कई
सहारा देते जाते हैं राहगीरों को ख़ामोशी से..अपने हिस्से चाहे तीखी धूप सही

ख़ूबियाँ क़ुदरत की बेमिसाल हैं..फिर भी आज़ाद हैं..वाह-वाह सुनने   और कहलवाने से…
हर बार जब मिलता हूँ सुकून से और ख़ूबसूरती मिल जाती है बहाने से…

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