परम-तत्व की अनुभूति

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ईश्वर हम सब से लगाव रखता है परंतु कुछ भाग्यशाली जीवों के समक्ष ही उसका प्रकटीकरण होता है। साधारणतः हमारी लौकिक महत्वकांक्षाएं, हमारे मन की चंचलता और हमारा अहम् हमें इस साक्षात्कार से वंचित रखते हैं। संतों के मतानुसार मनुष्य में आत्मबोध की जागृति होने तक परमात्मा उसके भीतर केवल एक मूक द्रष्टा बन कर रहता है। अपनी बेसबब कृपा से यदि ईश्वर हमारे भीतर सक्रिय हो जाए, तो कोई न कोई बहाने उसकी उपस्थिति का एहसास हमारे आध्यात्मिक सफर का बीजारोपण कर देता है। इसके मुख्यतः दो चरण माने गए हैं- दुःख से सुख तक की यात्रा और सुख से आनन्द तक की यात्रा। किसी चीज़ का अभाव अथवा किसी प्रकार का भय हमें दुःखी करता है। ईश्वर को परम सत्ता मानकर हम अपनी इच्छा-पूर्ति के लिए किसी सांसारिक द्वार पर जाने की बजाय पमात्मा को याद करते हैं। ईश्वर की ओर अग्रसर होने हेतु प्रारंभिक साधना में इच्छाओं का एक महत्वपूर्ण स्थान हैं क्योंकि गीता में भगवान ने स्वयं कहा है कि वह भक्त की मांग को पूरा करके उसकी आस्था को दृढ़ करते हैं। इस प्रकार अपेक्षित परिस्थिति सुख की उपलब्धि है परंतु अधिकांश लोगों की यात्रा लंबे अंतराल तक इस पड़ाव पर ठहर जाती है। एक के पूरा होने पर दूसरी चाह के जागने का चक्र तब तक चलता है जब तक जीव इन चाहतों के बोझ से थक न जाए – ‘‘एक मैं हूं सदा मांगता ही रहा, एक तुम हो जो मांगा दिए जा रहे हो।’’ परम सत्ता पर नितांत भरोसा कायम होने पर हम उसके प्रेम को महसूस करने लगते हैं। परिणामस्वरूप, प्रत्येक परिस्थिति अपने लिए हितकारी प्रतीत होती है और याचना करने का आवेग समाप्त हो जाता है- “न खुशी अच्छी है, न गम अच्छा है; जिस हाल में यार रखे, वो हाल अच्छा है।” प्रभु-इच्छा में ही प्रसन्न रहने की यह अवस्था मनुष्य को आत्म संतुष्ति से आनंद तक ले जाती है। लौकिक महत्वकांक्षाओं से निवृत्त होने पर एक आलौकिक प्यास उठती है, जो हमें परमेश्वर की खोज के लिए प्रवृत्त करती है। वह सदा से हमारे भीतर मौजूद रहा परंतु अप्रकट होने के कारण अब हमें उसकी कमी महसूस होने लगी। उसका परिचय पाने के लिए साधु संग, आध्यात्मिक अध्ययन व एकांतिक साधना में रुचि जगती है। ये अभ्यास हमारे चित्त को स्थिर और नैतिक गुणों को विकसित करते हैं। अनेक जन्मों से चली आई इस यात्रा का आखिरकार उस दौर में प्रवेश होता है कि साधक के हृदय में प्रज्वलित ईश्वर से मिलने की लौ उसके दोषों व उसकी सांसारिक आस्कितयों को स्वाहा कर देती है। परिपक्व आत्म-समर्पण से उसके अह्म का परमेश्वर में स्वतः विलय हो जाता है और परमानन्द की प्राप्ती होती है। संक्षेप में, जीव के स्वभाव के अनुरूप ईश्वर उत्तोरत्तर अपने पर्दे हटाने का कार्यक्रम रचता है और अंततोगत्वा सभी प्रकार के साधक- ज्ञानी, ध्यानी व प्रेमी अपने ही अंदर आह्लाद के रूप में परम तत्व की अनुभूति करते हैं।

7 Comments

  1. This is so beautiful and powerful. Just the feeling that God is watching over us and holding us by our hand to take us step by step to His Lotus Feet. My prayers for His compassionate glance upon all of us. Jai Sri Krishna. Thank YOU!

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