प्रेम ईश्वर है

Captu re

बाईबल का यह सूत्र- “ईश्वर प्रेम है” अनुभूति का विषय है, चर्चा का नहीं। आत्मबोध से ज्ञात होता है कि ईश्वर साक्षात प्रेम स्वरूप है। इसलिए कहते हैं कि जन्मों से चली इस यात्रा में किसी से सच्चा प्रेम किए बिना ईश्वर का एहसास होना कठिन है। इस पवित्र वाक्य यो यदि दूसरी तरफ से लिया जाए, तो यह कहना गलत न होगा कि ‘प्रेम ईश्वर है’ अर्थात जीवन में सच्चे प्रेम का जागृत होना साक्षात् ईश्वर की प्राप्ति है। प्रश्न उठता है कि ‘प्रेम’ तत्व है क्या? साधारणतः, किसी के प्रिय लगने को हम प्रेम की संज्ञा देते हैं परंतु प्रियता को प्रेम तभी कहा जा सकता है जब प्रिय लगने का कोई सुविचारित कारण न हो। प्रेम की डोरी आत्माओं को एक दूसरी की ओर सहज खींचती है और इसमें शारीरिक रूप-रंग, गुण-दोष, योग्यता-अयोग्यता, जाति-धर्म, रिश्ते-नाते की कोई भूमिका नहीं। इस उत्कृष्ट भाव की विशेषता है कि यह किसी बंधन का मोहताज नहीं, फिर भी प्रेमी स्वयं को अपने प्रीतम के साथ पूर्णतः बाध्य करके नितांत स्वतंत्रता का अनुभव करता है।

प्यार करना प्रेमी की विवशता होती है और हर परिस्थिति उसके प्रेम-भाव में नित्य वृद्धि करती है। इसमें सिर्फ समर्पण ही नहीं बल्कि अपने अस्तित्व का स्वतः विसर्जन हो जाता है। प्रेमी को अपने निजी सुख की कोई अपेक्षा नहीं रहती क्योंकि प्रियतम की खुशी ही उसे सुख प्रदान करती है।

स्वामी अखंडानंद सरस्वाती ने कहा कि द्वेष, घृणा, ईर्षा आदि की वृत्तियां प्रेम के विरोधी शब्द हैं। अतः किसी से सच्चा प्यार होने पर हमारे भीतर किसी भी अन्य के प्रति दुर्भाव नहीं टिक सकता। उदारता, सद्भावना व विनम्रता प्रेमी हृदय का मूलभूत स्वभाव है और केवल निःस्वार्थ सेवा के जरिए प्रेम व्यवहार में प्रकट होता है। प्यार प्रेमी की दृष्टि को भी प्रेममय बना देता है, जिसके फलस्वरूप, उसके लिए सारा संसार सेवा एवं प्रेम का पात्र बन जाता है। इस मनोभाव के उदय होने को ईश्वर की वास्तविक प्राप्ति माना जा सकता है।

“इक-तरफा इश्क सज़ा देता है, दो-तरफा इश्क मज़ा देता है
हर-तरफ का इश्क खुदा होता है।”

Image source- Google

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